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लेख

जरा सोचिए ! क्या कोई हमारे माइंड की प्रोग्रामिंग तो नहीं कर रहा है ?

लेखक – राम किशोर उपाध्याय
कल ट्रेन में दो लोग झगड़ रहे थे । ऐसा होना बिल्कुल नया नहीं है। हर जगह आजकल यही हो रहा है । मैं उन दो योद्धाओं के नाम तो नहीं जानता हूँ अतः पहचान की सुविधा के लिए उनका नाम रख लेता हूँ ।एक सबके हित की बात कर रहा था उसको ‘दास’ और दूसरा जो एक दल विशेष की बात कर रहा था उसका नाम ‘पंकज ‘ के नाम से पुकारते हैं । जो बातें मैंने सुनी उसके अनुसार ट्रेन के अक्सर लेट को लेकर थी। दास के पास ही पंकज बैठे थे ,व्यवहार से लग रहा था कि शायद वे एक दूसरे से परिचित थे। बात से बात निकली और जैसा कि अक्सर हम सब के साथ आजकल हो रहा है कि हम राजनीति में घुस जाते हैं । दास पंकज को कॉंग्रेस का आज़ादी में योगदान ओर नेहरू के भारत के नवनिर्माण को सुना रहा था तो पंकज नेहरू और आजतक उनके परिवार को भारत की वर्तमान दुर्दशा के लिए जिम्मेदार बता रहा था । पंकज की ओर से इतना कुछ कहा गया कि कोच में हिंसा की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी क्योंकि उनके साथ दलीय प्रतिबद्धता रखने वाले लोग दो खेमों में बंट गए थे,जो एक बुजुर्ग के हस्तक्षेप से बड़ी मुश्किल से रुकी ।
इस घटना को दरकिनार कर सोचे कि क्या हम सुबह- शाम, रात-दिन,दफ्तर में ,ट्रेन में,शादी में,रिश्तेदारी में और तो और सोते समय पत्नी से बिस्तर में भी यही बात पिछले सात आठ साल से लगातार क्यों कर रहे है। कुछ लोग अपवाद हो सकते हैं और उनमें से अपवाद मैं बिल्कुल नहीं हूं।आजकल मैं जिस पार्क में घूमता हूँ वहां कई लोग आपस मे मिलते ही शुरू हो जाते है। वो यह भी ध्यान भी रखते कि वे किस उद्देश्य के लिए पार्क में आये हैं। बस वही सब बातें जिन्हें हम दिनरात फेसबुक और व्हाटसअप में देखते हैं सुनते हैं ।ऐसा नहीं है कि राजनीति आवश्यक नही है,ये बहुत जरूरी है । किन्तु क्या 24 घण्टें,सातों दिन,बारहों महीने और सालों साल सिर्फ राजनीति ही करनी है । यह एक विचारणीय प्रश्न है। जिस देश का जीड़ीपी चीन से नीचे हो, वहां के लोग दिन पर लोग व्हाट्सअप पर फेसबुक पर,निजी वार्तालाप में कामधाम छोड़कर एक दूसरे को अज्ञान, नफरत और हिंसा परोस रहे हैं,मगर क्यों ? ये लोग पहले तो ऐसे न थे ।इन्हें कोई यह सब करने के लिए अदृश्य रूप से प्रेरित कर रहा है। ये लोग जब पहले मिलते थे चौपाल पर,पान की दुकान पर,क्लब में,ट्रेन में,दफ्तर में तो परिवार की कुशलक्षेम पूछना,दुख दर्द में मदद करना ,किसी के काम आना और नहीं तो अपने काम में लगे रहना या अपने में मस्त रहना। जरा शांत मन से सोचिए ! यह सब क्यों हो रहा है? क्या देश,समाज या जाति पर खतरे वास्तविक है? क्या हमारे सुरक्षाबल कार्य नहीं कर रहे है ? क्या उनके रक्षा संबंधी कोई प्रोटोकॉल नहीं हैं?क्या हमारे वाकयुद्ध से सुरक्षा होगी ? सुरक्षा का जिम्मा हमने चुनी हुई सरकार को नहीं दिया है ? ऐसा भी नहीं है कि हमें देश की चिंता नहीं करनी चाहिए । नागरिक का प्रमुख कर्तव्य समय पर कर चुकाना,अपने कार्य को निष्ठा से करना और सरकार पर निगाह रखना कि उसके द्वारा अदा किए कर को वह ठीक ढंग से खर्च कर रही है,या नहीं, और वह हमारी आर्थिक,सामाजिक और सामरिक रूप से बाहरी प्रभावों से रक्षा कर रही है या नहीं। लोकतंत्र में यह कार्य हमने विपक्षी दल को दिया है कि वह सरकार पर निगाह रखे। नागरिक का यह भी कर्तव्य है कि विपक्ष पर भी निगाह रखे कि वह उसके नागरिक हित और कल्याण की रक्षा कर रहा है कि नहीं और चुनाव के समय मतदान करें और अकर्मण्य दल को हटा दें।
एक बात जो मुझे सबसे ज्यादा चिंतित कर रही है कि आज हम राजनीति के कारण मित्र ,रिश्तेदार और मानवीय सम्बन्ध खोते जा रहे है। कौन है जो हमारा उपयोग कर रहा है,उसका क्या हित है,वह हमारी इतनी अतिशय चिंता क्यों कर रहा है? इसका कोई तो कारण होगा। जरा सोचिए! क्या हमें कोई मानसिक गुलाम तो नहीं बना रहा है ? क्या हम हर समय किसी के विचार के अनुरूप तो नहीं ढल रहे हैं? क्या कोई हमारा विवेक,सामर्थ्यऔर बुद्धि/ मेधा को तो नहीं छीन रहा है ? क्या कोई हमारे माइंड की प्रोग्रामिंग (programming)तो नहीं कर रहा है ? क्या हम किसी के क्लोन तो नहीं बन रहे हैं? मित्रो,जीवन में सकारात्मक करने को बहुत कुछ है । सबसे महत्वपूर्ण है ,प्रेम करना । हम प्रेम करे खुद से,पर्यावरण से,पत्नी से,प्रेमिका से,पति से,बच्चों से ,पड़ौसी से और अपने व्यवसाय से।यदि ऐसा करेंगे तो देश से प्रेम और उसकी सेवा तो अपने आप हो जाएगी। हर वक्त राजनीति पर चिंतन का नहीं होता क्योंकि राजनीति न तो किसी धर्म का ग्रंथ है और न राजनेताओं के द्वारा कही गयी बातें किसी संत,औलिया,दरवेश,साधु,महंत या जोगी के हमारे आत्मिक कल्याण हेतु प्रस्फुटित कोई प्रवचन हैं । जरा सोचिए तो सही!!

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