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महर्षि वेदव्यास की जन्म स्थली हैं पर्यटक स्थल।

कालपी (जालौंन)।(पवनदीप निषाद) पवित्र गंगा का तट ज्ञान का तट हैं तो यमुना का तट प्रेम किनारा हैं कान्हा के रंग मे रंगी यमुना नदी अभी भी गहराती बलराती कनुप्रिया सी सावन भादों में बलखाती हैं यमुना के कल-कल निनाद ने जाने कितने ऋषियों, मुनियों, औलियाओ, पीरो, फकीरो, राजाओ, कबियों, महर्षिवेदव्यास, अब्दुल रहीम खानखाना, इतिमान ब्रम्हा आचार्य शारीपत, मूलकदास, रसिकेन्द्र मोहन, महेशदास उर्फ बीरबल आदि रसिक जनो के हृदय को आन्दोलित किया हैं। ऊॅचे-नीचे, टेढे़-मेढे़ नालों, टूटी-फूटी हवेलियों, छोटी सकरी गलियों औंर अनगिनत मंदिरो, मज्जिदों से घिरी धूप-छाहीं विश्व विख्यात हिन्दुओ की पवित्र धार्मिक उपकाशी तथा मुस्लिम धर्म का उपकावा शरीफ मक्का मदीना कालपी शरीफ बस्ती अतीक की न जाने कितनी सुखद यादें संजोये हैं। इतिहासिक, पौंराणिक व धार्मिक नगर की ईट-ईट में इतिहास की कहानियां विखडी़ पडी़ हैं नगर में अनगिनत मंदिर व मज्जिदों के खण्डहर इतिहास के कालपात्र से खड़े अपने समय की गवाही सी दे रहे हैं।
व्यास तीर्थ कालपी धाम महाभारत के अमर गाथाकार वेदव्यास की जन्म स्थली के रूप में चर्चित यह क्षेत्र राजा शान्तनु की रानी सत्यवती (मत्स्यगंधा) का मायका हैं। पुराणां के अनुसार श्री कृष्ण के पुत्र शाम्ब ने यहीं सूर्य की उपासना की थी प्रसिद्ध ज्योतिशाचार्य बराह मिहिर ने कालप्रिय नाथ के मंदिर क्षेत्र में जगविख्यात सूर्य सिद्धान्त का प्रतिपादनकिया था। यह क्षेत्र इस नगरी से 16 किलोमीटर दूर पूर्व की ओर मदरालालपुर नामक गांव के पास सूर्य कुण्ड के नाम से जाना जाता हैं। यहां कालप्रिय नाथ के मन्दिर के नाम पर सूर्य की भग्नप्रतिमा, सूर्य चक्र, टूटे खम्बे व टूटे पाषाण मिलते हैं। इसी जगह को कुष्ट निवारण कुण्ड भी इतिहासकार मानते हैं इसी मशहूर स्थान के पास सतमडि़या समाधि स्थल भी मौजूद हैं। यह राजा श्री चन्द्र की पटरानी लोढा़के नाम से लोढा़ भी कहा जाता महर्षि वेदव्यास जी की जन्म भूमि विश्व विख्यात कालप ऋषि की तपो भूमि काल्पी नाम के चर्चित कालपी नगरी के पावन क्षेत्र में इतिहास के अंको में मनोरत व्यास घाट, किलाघाट, पीलाघाट, मौरीघाट, राजघाट, बाईघाट, महाघाट, राधा-माधव बांकेविहारी घाट आदि।कालपी सहित पूरे विश्व को ज्ञान, धर्म, भाईचारा एकता अखण्डता समेत चार वेद अठ्ठारह पुराणो के रचानाकार विश्व विख्यात भगवान महर्षि वेदव्यास जी का आलीशान प्राचीन मन्दिर तथा मन्दिर के पीछे नीम की जड़ में प्रकट श्री गणेश भगवान का स्वरूप इसी जगह पर भगवान महर्षि वेदव्यास जी ने चार वेद, अठ्ठारह पुराणो को बोला था जिसे पीछे बैंठकर गणेश जी ने लिखे थे जो आज भी उसी स्थान पर सुशोभित हैं ऐसाइतिहासकार मानते हैं।
वहीं पर वर्तमान में दक्षिण के श्रीमद् सुधीन्द्र तीर्थ स्वामी गुरू महाराज के कृपा पात्र से भगवान श्री बाल व्यास मन्दिर का भव्य निर्माण हुआ हैं जिसमें करोडों धन खर्च किया गया। नवीन श्री बाल व्यास मन्दिर के गर्भ ग्रह में श्री राम भगवान मन्दिर, श्री नरसिंह भगवान मन्दिर, श्री कृष्ण भगवान मन्दिर, श्री वैंकटेंश भगवान मन्दिर, श्री वामन भगवान मन्दिर, श्री परशुराम भगवान मन्दिर व श्री महालक्ष्मी मन्दिर आदि। इसी जगविख्यात मंदिर के गर्भ ग्रह में श्री वेद व्यास भगवान के पिता ऋषि पाराशर व माता सत्यवती(मत्स्यगंधा) की गोद मे विराजमान श्री बालव्यास भगवान समेत आठ आलौकिक मन्दिर स्थपित हैं।
हर्ष कालीन बड़ा स्थान लक्ष्मीनारायण मन्दिर, कालिया स्थान हनुमान मन्दिर, स्वतंत्रता संग्राम के पुराधा चन्दशेखर आजाद का अज्ञातवास का स्थान हैं, महा भारत कालीन पातालेश्वर, बटाऊ लाल हनुमान मन्दिर, भीष्म के द्वारा स्थापित भीमसैन मन्दिर, भीमसैन पत्नी हिडम्बा द्वारा स्थापित तरीबुल्दा स्थित दक्षिणामुखी हनुमान प्रतिमा, शक्ति पीठ मॉं बनखण्डी देवी मन्दिर, प्राचीन काली देवी मन्दिर, जैन मन्दिर, जगविख्यात लंका मीनार, नवीन नवनिर्मित मृत्युज्जय भगवान का मन्दिर, सम्राट अकबर के हाजिर जनाब नवरत्न बीरबल उर्फ महेश दास का रंगमहल, चन्देलकालीन कोषागार, किला व रानी लक्ष्मी बाई का अंग्रेजो से युद्ध कालीन अज्ञातवास स्थल, वन विभाग का शानदार गेस्ट हाउस किलाघाट, बाकें विहारीधाम मन्दिर, काली हवेली, सुभान गुण्ड़ा हवेली, हिन्दी संग्रहालय, कालपी शरीफ स्थित चौरासी गुमंद के नाम से प्रसिद्ध लोदीशाह बादशाह के मकवरे का निमार्ण कंकड़ के प्रस्तर खण्ड़ो द्वारा चूने के मसाले से हुआ हैं। चतुर्दिक 38-45 वर्ग मी0 एंव 24-38 मी0 ऊॅंचे यह स्मारक सात चौकोर मोटे स्थम्भो से विभाजित सात संर्कीण मेहराव दार प्रवेश द्वारो के कारण महत्व पूर्ण हैं सम्पूर्ण स्मारक स्तम्भो की आठ पंक्तियों वाले प्रवेश इस प्रकार 64 स्तम्भों का निर्माण करते हुये सतरंज के पट के समान विस्तृत हैं। तथा दोहरी 49 मेहरावो से संयोजित है इसमें समाहित 49 अंतरालीय स्थान समतल छतो से आवृत हैं मध्य भाग में चार स्तम्भ बने है इसके द्वारा प्राप्त मध्य चौकोर स्थल के ऊपर 20ण्88 मी0 ऊॅचा भव्य गुम्मद निर्मित हैं स्मारक की मुख्य संरचना के ऊपर र्निमित समतल छत पर चार गुम्मद चारो कोणो को बांधते हुये र्निमित हैं इसी के समीप वाह कोणो पर स्थ्ति ढलुआ मीनारो के लघु आकार के गुम्मद बने हैं परन्तु मध्य का भव्य गुम्मजो 12-19 मी0 ऊचॉई हैं की ग्रीवा वेलनाकार हैं तथा समतल छत वाहृय आकार में अधिक स्पष्ट एंव भव्य हैं गुम्मज के सभी अलंकरण पलास्टर पर अंकित हैं यह मकवरा प्राचीनतम उधान युक्त मकवरा प्रतीत होता हैं जिसके चतुर्दिक र्निमित प्रवेश द्वारो से होकर प्रांगण में प्रवेश किया जाता हैं।
हिन्दी भवन, पाहूलाल मन्दिर, कर्दम मार्कण्डेय आदि ऋषियो की तपो भूमि, महर्षि पारासर ऋषि का तप क्षेत्र, पाण्डवो के द्वारा निर्मित पचपिण्ड़ा देवी मन्दिर जिसमें छोटी-बड़ी पचपन मठियां हैं, आनन्दी देवी मन्दिर, नरसिंह टीला, सॉई मन्दिर, रामवाटिका सिद्ध दायत्री मन्दिर, लड़ैती देवी मन्दिर जो नगर से लगभग तीन-चार किलो मीटर घने जंगल में स्थित हैं, लगभग 300 बर्ष पुराना राम भक्त हनुमान मन्दिर राजघाट, जो हनुमान गढ़ी एंव चौकी मन्दिर के नाम से चर्चित हैं जो भक्ती एंव आस्था का केन्द्र विन्दु माना जाता हैं वह आज जर्जर होकर गिरने की स्थित में हैं, शीतला देवी मन्दिर, मंशा देवी मन्दिर, संकटा देंवी मन्दिर, भगवान चित्रगुप्त का मन्दिर, मराठा सरदार तथा झांसी रियासत की साम्रज्ञी क्रान्ति वीर रानी लक्ष्मी बाई झांसी द्वारा स्थापित श्री गणेश मन्दिर जिसमें छत्रपति महाराज शिवा जी के गुरू समर्थ गुरू रामदास जी द्वारा निर्मित बलुई गणेश प्रतिमा श्रद्धालुओं की भक्ति को दृढ करती हैं जो मन्दिर प्रांगण में घेरूआ में स्थित बलउ पत्थर की श्री गणेश जी की मूर्ति प्रस्फुटित हैं इस मूर्ति के अलावा दो मनोहारी मूर्तिया एक ही सिंहासन पर विराजमान हैं। तथा हस्थिनापुर दिल्ली गद्दी तथा महाभारत के महानायक पाण्डव के गुरू द्रोंणाचार्य के अमर पुत्र अस्त्वतथामा द्वारा श्राप मुक्ति व पश्चाताप करने हेतु स्थापित पातालेश्वर, ढोड़ेश्वर, भूरेश्वर, कपिलेश्वर, फालेश्वर, लुढकेश्वर, बानेश्वर, भोलेश्वर, गोपेश्वर, रामेश्वर, तिगरेश्वर समेत ग्यारह शिव लिंगो के कारण जनश्रुतियो, ऋषिवाणी में कहा जाता है कि महाभारत के महानायक अस्त्वतथामा आज भी श्राप मुक्ति हेतु कालपी के तपोवन में तपस्या में लीन हैं। तथा वह प्रतिबर्ष महाशिव रात्रि के दिन तिगरेश्वर मन्दिर के शिव लिंग की आज भी पूजा-अर्चना एंव दूध से स्नान कराते हैं।
बर्ष 1802 में मेहरे वशोद्भव लाला पाहुलाल द्वारा निर्मित विख्यात पाहुलाल मन्दिर के मुख्य केन्द्रीय भाग में राधा कृष्ण की श्वेत और श्याम विशाल प्रतिमाओ के साथ आंगन व दललानो की प्राचीरो में पंचमुखी हनुमान, चित्रगुप्त धर्मराज, बल्दाऊ जी की कलात्मक मूर्तियां स्थापित हैं कला के चिर सुन्दर रूप में सूकर कच्छ, नृसिंह, जामन, परशुराम, रामकृष्ण, जगन्नाथ, कलंकी एंव बद्रीनाथ आदि दसावतारो के प्रमुख पात्रो के अलावा पंच कन्याओ अहिल्या, कुन्ती, द्रोपती, सीता, मंदोदरी तथा देवियों राक्षसराज रावण उसका सम्पूर्ण वंश गोरखनाथ, काल भैरव आदि प्रतिमाओं मुस्लिम धर्म गुरूओ, औलियाओं, पीरो, फकीरो की मशहूर कालपी शरीफ के अनूठे इतिहास में मदारसहाब हजरत बदरूद्धीन शाह की जिन्दा बैंठक मत्स्यगंधापुर मदारपुर में आज भी मौजूद इसी जगह सरकारी दीवाल के पाषाण के साथ एक पत्थर का तराशा हुआ शेर चिल्ला व कलात्मक चिरागदान आज भी पुरातत्व विदो के आकर्षण के केन्द्र बिन्दु हैं तथा मदारसहाब बाबा के चार दीवारी के पास बडे़ गुम्मद में सफेद रंग का झण्ड़ा लगा हैं जो विश्व को परमशान्ति का सन्देश देता है तथा हिन्दू-मुस्लिम सभी धर्मो का एकता का प्रतीक हैं। एंव यहॉ पर प्रतिबर्ष बसंत पंचमी के दिन एक दिवसीय हिन्दू-मुस्लिम सभी धर्मो का एकता का विशाल मेला लगता हैं जिसमें कोने-कोने से चलकर आने वाले सभी धर्मो के लोग शामिल होते हैं, कालपी शरीफ में हजरत सालार सोख्ता, पीर बंजानी, कासिम चिश्ती, दीवान औलिया, शहीद चोर बीबी, बहादुर शहीद आदि नामी फकीर हुये हैं जिनकी मजारो पर मुस्लिम धर्म के लोग आज भी चादर चढाते है मन्नते मानते है तथा देश के कोने -कोने से लोग आते हैं मुस्लिम धर्म गुरूओं ने कालपी प्रतिनिधि ‘‘पवनदीप निषाद‘‘ को बताया कि फकीरो पीरो का शहर शरीफ जहां जमीन के जर्रे-जर्रे में पीर लेटे है और जहां खुद कई खिदमतगार पैरो के बल नहीं सिर के बल चलने को तैयार रहते हैं। तथा औलियाओ के मशहूर शहर कालपी के लिये धर्म गुरूओ का कथन यह भी हैं कि कालपी मक्का तू फरजन्द रसूल कुशी, अकबर इलाहाबादी भी काली का मक्का मानते थे और सैंयद तिरमिजी को अपना पैगम्बर।
दरिया जमुन का ताजा पानी पीने वाले पीर सैंयद मु0 तिरमिजी ने देवबंद के मदरसे के समान खानखाह शरीफ की स्थापना कालपी में की। उन्होने अकबराबाद से नक्शबंदी परम्परा में दीक्षा ली व कुतुब आलम की उपाधि धारण कर कालपी में 1047 हिंजरी में शानदार उल्मा, आलिम, हाफिज व मौलवी आदि की तालीम दिये जाने वाले मदरसा की स्थापना की थी।
हजारों बर्ष पुराने कालप ऋषि के नाम से बसे नगर कालपी धाम, कालपी शरीफ 26ण्8 उत्तर आकाश पर झांसी, उरई, कानपुर मार्ग के मध्य स्थित हिन्दू-मुस्लिम पवित्रता की गाधा गा रहा हैं।
यहॉ पर देशातन व तीर्थ करने देश-विदेश के कोने-कोने से नामी गिरानी लोग अक्सर आते जाते हैं,और यहॅा मन्दिर, मजारो के दर्शन करते हैं। बस इस धार्मिक नगरी कालपी को पर्यटक स्थल का दर्जा चाहिये ंतो आओ हम सब व्यास तीर्थ कालपी धाम की परिक्रमा करे और इस मनुष्य रूपी शरीर को सफल बनायें ।
फोटो परिचय – 1 महर्षि वेद व्यास जी, 2 – पारासर ऋषि एंव माता सत्यवती की गोद मे विराजमान बाल व्यास, 3 – शक्ति पीठ मां बनखण्डी देवी, 4 – प्राचीन गणेश मंदिर, 5 – सूर्य मंदिर, 6 – मदार साहब बाबा एंव बड़े गुम्मद में लगा सफेद झण्डा।

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