Home उरई धृतराष्ट्र बना खनिज दफ्तर, नदी की जलधारा से पाॅकलैंड मशीनों से हो रहा मौरम खनन
उरई - 4 days ago

धृतराष्ट्र बना खनिज दफ्तर, नदी की जलधारा से पाॅकलैंड मशीनों से हो रहा मौरम खनन

0 कार्यवाही के नाम पर होती खानापूर्ति
0 नजूल, निजी भूमि तो छोड़िए पट्टाधारक ने मरघट तक नहीं छोड़ा
0 मामला भेड़ी खुर्द के मौरम खंड संख्या एक से जुड़ा

सत्येन्द्र सिंह राजावत
उरई (जालौन)। मौरम खनन का पट्टा हासिल करने के बाद भेड़ी खुर्द के मौरम खंड संख्या एक का पट्टाधारक नियम, कायदे कानूनों को ताक पर रखकर मानक से कहीं अधिक पाॅकलैंड मशीनों से सदानीरा बेतवा नदी की जलधारा से चैबीस घंटे मौरम का अवैध तरीके से खनन कर लाल सोने की लूट में मस्त नजर आ रहे हैं। तो खनिज दफ्तर के जिम्मेदार अधिकारी ऐसे मामलों का संज्ञान लेना तो दूर की बात संबंधित मौरम खंड तक जाने की जेहमत नहीं उठा पा रहे हैं। यदि बहुत ज्यादा हो हल्ला होता है तो दफ्तर के कुछ कर्मियों को भेजकर जांच के नाम पर खानापूर्ति करने का प्रयास किया जाता है। यही कारण है कि पट्टाधारक नजूल, निजी व वन भूमि तो छोड़िए सार्वजनिक हित के मरघट तक की जमीन से मौरम खनन करने से नहीं चूकते हैं।
जनपद में मौरम खनन का कारोबार एक तरह से कोयले की कोठरी जैसा ही होता है। जो भी व्यक्ति मौरम का पट्टा हासिल करता है वह उसे ईमानदारी से नहीं चला सकता। लम्बा मुनाफा कमाने के चक्कर में वह सबसे पहले वन भूमि, नजूल भूमि फिर निजी भूमि पर गिद्ध जैसी नजरें जमा लेता है और जैसे ही उसे मौका मिलता है तो वह पाॅकलैंड मशीनों को मैदान में उतारकर जमीन का नक्शा ही बदलने से नहीं चूकता है। ऐसा ही हाल आजकल भेड़ी खुर्द के मौरम खंड संख्या एक का पट्टाधारक करने में जुटा हुआ है। फिर चाहे नदी की जलधारा से मौरम खनन करना हो या फिर नदी नजूल या निजी भूमि से मौरम खनन हो। पट्टाधारक को इस तरह से खुलकर मौरम खनन करने के लिये खनिज दफ्तर से संरक्षण की आवश्यकता होती है जिसे वह किसी भी प्रकार से हासिल कर लेता है। पिछले दिनों जब भेड़ी खुर्द में उक्त पट्टाधारक द्वारा मरघट की जमीन से मौरम खनन करने का मामला गरमाया तो डीएम के निर्देश पर खनिज दफ्तर के सर्वेयर ने पहुंचकर उक्त जमीन को पट्टाधारक के ऐरिया में होने की बात कहते हुये मानचित्र भी बना डाला। जबकि गांव के ग्रामीणों का साफ तौर पर कहना था कि हम लोग दशकों से उसी स्थान पर गांव के किसी भी व्यक्ति की मौत होने के उपरांत अंतिम किया करते चले आ रहे है। उस दौरान मौरम का कोई पट्टा भी नहीं होता था। ऐसी स्थिति में कौन सही बोल रहा है और कौन गलत बोल रहा है यह तो जांच का विषय हो सकता है। लेकिन इस मामले में ग्रामीणों की बात सही मानी जा सकती है कि वह दशकों से उसी स्थान पर किसी भी व्यक्ति की मौत होने पर अंतिम संस्कार करते चले आ रहे है। इसे कोई भी व्यक्ति नकार नहीं सकता है। अब देखने वाली बात तो यह होगी कि क्या खनिज अधिकारी नदी की जलधारा से मौरम खनन करने पर रोक लगा पायेंगे या फिर वह पट्टाधारक को इस मामले में सहभागी बनकर अपना मुंह बंद रखेंगे यह तो समय ही बतायेगा।

लिखा न पढ़ी जो सर्वेयर कहे वह सही

उरई। जब से जिले में बेतवा नदी से मौरम पट्टा हासिल करने की होड़ शुरू हुयी है तभी से खनिज दफ्तर के सर्वेयर की महत्वपूर्ण भूमिका हो गयी। सर्वेयर मौके पर बगैर जाये ही पट्टाधारक के रकवे का सीमांकन करते रहे और यदि अवैध मौरम खनन मामले में पट्टाधारक की गर्दन फंसी नजर आयी तो भी सर्वेयर कागजी मानचित्र में हेराफेरी करने से बाज नहीं आते। नदी की जलधारा से मौरम खनन करने के मामले में सर्वेयर की क्या भूमिका रहती है यह तो झांसी मंडल के जालौन, ललितपुर व झांसी जनपद की जिम्मेदारी संभालने वाले सर्वेयर वेदप्रकाश शुक्ला पर काम का बोझा अधिक होने से वह यदाकदा ही खनिज कार्यालय में आते है। फिर भी उनसे जिले के सभी पट्टाधारक संतुष्ट नजर आते हैं। आये भी क्यों न किसी भी पट्टे का सीमांकन उन्हीं के द्वारा किया जाता है।
फोटो परिचय—
बेतवा नदी की जलधारा से मौरम खनन करती पाॅकलैंड मशीनें।

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